Tuesday, June 15, 2010

आख़िर वो शख़्श कौन था

कल शाम एक बार फिर,
मिला उससे
फिर वही उसी गर्मजोशी के साथ
जैसे मिलता था
पहले कभी
एक बार फिर शुरू हुयी कुछ बातें
कुछ पुरानी
कुछ नयी,
कुछ कही
कुछ अनकही,
फिर ऐसे ही उस
मुलाकात के बाद
लौट आया अपने घर
और फिर रात भर आँखों से नींद जाती रही
केवल सोंचता रहा
उस मुलाकात के बारे में,
क़ि उसने भी मुलाकात के दौरान
कई बार 'मै' कहा,
और मैंने भी कई बार 'मै' कहा,
और अब मै परेशान हूँ क़ि
आखिर ये शख्श 'मै' है कौन..?
जिसने कल मुझ दोनों को
'हम' नहीं होने दिया...!!

14 comments:

  1. अच्छी कविता कह गए. शुभकामनाएं.

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  2. Gaharayi liye huye sundar rachna...

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  3. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  4. sach kaha main ke age soch hi nahin pate.sankat bas isi main ka hai.varna ham se tau sari samsayayen hi hal ho jayen
    good poemvandana

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  5. गहरी सोच प्रकट करती ये रचना ......बहुत बढ़िया प्रस्तुती

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  6. खुद को तलाशने में एक ज़िंदगी भी कम पड़ जाती है ..आप खुद से मिल तो लिए...मैं को मैं से जोड़कर हम बन ही जायेगा एक दिन..अच्छी कविता है .

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  7. Achhee rachna.....
    Main se Hum tak ke safar ke liye meri dheron shubhkaamnaen!
    Ashish :)

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  8. हुजुर यूं ही लिखते रहें...

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  9. bahut khub sir.........shubhkamnayein

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