Sunday, August 15, 2010

क्या हम आजाद है ..??

 कल शाम में  दूरदर्शन पर महामहिम राष्ट्रपति जी का देश के नाम सन्देश सुना ...अगर उसमे की एक दो बातो को छोड़ दिया जाये तो उनका पूरा का पूरा भाषण उसी प्रकार हवाई भाषण था जैसे की उनकी कुछ महीने पहले हुयी सुखोई विमान यात्रा ...काश उन्होंने भारत के किसी ग्रामीण अंचल में बैलगाड़ी पे यात्रा की होती तो उनकी बाते भी जमीन से जुडी होती...!!

बची खुची कसर हमारे प्रधानमंत्री जी ने आज सवेरे लाल किले की प्राचीर पर से देश को संबोधित करके पूरी कर दी ...देश को किस प्रकार से अपनी बातो में बहलाया जा सकता है ये इन दोनों अभिभाषनो से देखा जा सकता है ...

हमारा भारत १५ अगस्त १९४७ को असंख्य बलिदानों के कारन आजाद हुआ परन्तु उसके
तुरंत बाद ही अंग्रेजो की मानसिक औलादों ने भारत को पुनः गुलाम बना लिया
और अबकी से ये गुलामी पहले की गुलामी से बहुत अधिक खतरनाक है और अब तक ये
गुलामी पूरे ६३ साल की हो गयी है और लगातार जारी है..!

पर अब विडम्बना और भारत माँ की लाचारी ये है कि उस समय जब अंग्रेजो ने गुलाम बनाया था तब आजादी के लिए संघर्ष करने वाले बहुत से महामानव हुए और भारत को आजाद करवाया भी पर अब आज कोई माँ भारती को आजाद करने के लिए आगे नहीं आ रहा है ..!

शायद सभी लोग ने अपने तथाकथित चाचा की वो बात जो की उन्होंने आजादी मिलने के बाद युवाओ से कही थी कि अब आप लोग अपने अपने कामो में मसलन अपनी पढाई ,काम धंधे में लौट जाइये और देश की चिंता हम पर छोड़ दीजिये ...और ऐसा हुआ भी ...लोगो ने सारा भार उनपर छोड़ दिया और खुद निश्चिन्त होकर अपने अपने कामो में व्यस्त हो गए ...और आज तक उन कुटिल चाचा के परिवार ने भारत को गुलाम बनाया हुआ है ..!!

भगवान बुद्ध ने कहा था कि परंपरा या अनुभव के नाम पर किसी कि बात पर भरोसा न करो | सोचो कि तुम्हारे हित में क्या है और कौन सा रास्ता सबके लिए कल्याणकारी है | वाही रास्ता चुनो |फैसला उसी सोच से निकलेगा |

उन्ही के समकालीन एक चीनी विद्वान सु...न सु ने अपनी पुस्तक युद्धकला में कहा था कि अंततः जीत उसकी होती है जिसके पास ससूचनाये होती है ,जो सोचता है |

लगभग ढाई हजार साल पहले बुद्ध और सुन सु ने सोचने कि क्षमता पर जोर दिया था ,सोचने कि आजादी कि हिमायत कि थी |

आजाद भारत में सबसे बड़ा और पहला झटका इसी सोच को लगा | उसने सवाल पूंछना बंद कर दिया | अर्थशाष्त्री अमर्त्य सेन जिसे "बहसबाज भारतीय " कहते है वह संख्या में निरंतर कम होता गया और लगातार कम होता जा रहा है ...!
लोगो ने यह मानना शुरू कर दिया है कि जो काम हमारी सरकारे कर रही है वो सही है या गलत है या फिर उसका हमारे से सीधा समंध नहीं है तो फिर मै उसकाप्रतिकार क्यों करू....भले ही वह काम देश और समाज को काफी हानि पंहुचाने वाला ही क्यों न हो ...लोगो को ये सोच तो विकसित करनी ही होगी कि हमें सिर्फ अपने लिए ही नहीं अपितु अपनो के लिए भी जीना होगा..!!

13 comments:

  1. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.............

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  2. बहुत सुन्दर...!!
    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!

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  3. स्वाधीनता दिवस की अनेक शुभकामनाएं.

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  4. यही उदासीनता उनके हौसले बुलंद करती है..

    स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

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  5. साथी आपके ब्लॉग का चक्कर काट कर आ रहा हूँ. बहुत सुन्दर सजाया है. अच्छे विचार ओए समाचारों के लिए बधाई. कभी समय मिले तो मेरी गुफ्तगू में भी शामिल हो.
    www.gooftgu.blogspot.com

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  6. बहुत ही बढ़िया विश्लेषण. आज लोगो के सोचने का वक़्त ही नही है देश तो दूर की लोग तो पास पड़ोस के बारे में भी सोचना गबरा नही करते

    rachanaravindra.blogspot.com

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  7. SHANU JI MAI AAPKI BAATO SE PURI TARAH SAHAMAT HUN.Sach me yah ek bahut hi sochniy prashn hai ki ham pahle aazad the ya ab aazad hain ---------?

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  9. विचार शून्यता का तो नहीं हाँ नपुंसकता का दौर तेजी से आ रहा है...जो करते हैं वे सोचते नहीं..जो सोचते हैं वे करते नहीं..!

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  11. आपकी बात सोचने को मजबूर करती है.शुभकामनायें.

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  12. जो ताकतवर है वे आम आदमी को न सोचने पर विवश करते हैं । अगर आप एक्सीडेन्ट मे घायल व्यक्ती को अस्पताल पहुँचायें तो पुलिस आपको दस झमेलों में फंसा देती है आम आदमी अपने ही उलझनों से उबर नही पाता अदालतों के चक्कर कैसे लगाये ।
    आपकी ये पोस्ट सोचने को मजबूर तो करती है पर राह नही सुझाती ।

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  13. प्रिय बंधुवर सानु शुक्ला जी
    नमस्कार !
    बहुत महत्वपूर्ण हैं आपके विचार …
    … और सानु भाई , कुटिल चाचा की विष बेल निरंतर फैलती ही जा रही है । कुटिल चाचा कबके रक्तबीज को मात कर चुके ।

    आपके लिए मेरी एक रचना के कुछ अंश सादर समर्पित हैं …

    हत्यारे नेता बन बैठे !
    नाकारे नेता बन बैठे !
    मुफ़्त का खाने की आदत थी
    वे सारे नेता बन बैठे !

    गिद्ध भेड़िये हड़पे सत्ता !
    भलों - भलों का साफ है पत्ता !
    न्याय लुटा , ईमान लुट गया ,
    ग़ाफ़िल मगर अवाम अलबत्ता !

    जीवन सस्ता , महंगी रोटी !
    जिसको देखो ; नीयत खोटी !
    नेता , दल्ले , व्यापारी मिल'
    जनता की छीने लंगोटी !

    मुश्किल बंदोबस्त कफ़न का !
    मुश्किल में हर गुल गुलशन का !
    सबने मिलकर आज किया है
    देखो , बंटाधार वतन का !

    मक़्क़ारों की मौज यहां पर !
    गद्दारों की मौज यहां पर !
    नेता पुलिस माफ़िया गुंडों
    हत्यारों की मौज यहां पर !


    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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