Saturday, July 3, 2010

तुम्हारी याद के बादल

अरे देखो तो
इन पर्वतों के कन्धों पर
लदे है ये
शरारती बच्चों क़ि तरह
शरारत करते हुए
खेलते उमड़ते घुमड़ते बादल|

ठीक वैसे ही
जैसे क़ि मेरे  दिमाग पर
मेरी याददाश्त पर लदे हों
बरस जाने को
एक दम आतुर
तुम्हारी याद के बादल...!!

10 comments:

  1. बहुत खूबसूरत तुलना की है ..
    सुन्दर कविता.सुन्दर ख्याल.

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  2. बरस जानो दो यादो को...रोकना नहीं ......खुद ही भींग जाओ

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  3. achchha lagaa padhkar....badhiya

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  4. वाह बहुत सुंदर...... आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा ये नन्ही बूंदे तन मन को भिगा गई.......

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  5. bahut badhiya ......www.gaurtalab.blogspot.com

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  6. सभी महनुभवों का हौसला अफजाई के लिए हम हृदय की गहराई से आप सभी के अभारी है ...!!

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आपके आशीर्वचन हमारे लिए... विश्वाश मानिए हमे बहुत ताक़त मिलती आपकी टिप्पणियो से...!!