Tuesday, September 17, 2019

तुम्हारा मौन ‬



तुम्हारा ‬
‪बोलना कुछ भी‬
‪एक बहती हुयी नदी के सदृश है!‬
‪और तुम्हारा मौन ‬
‪अथाह जल रश्मियों से निमग्न ‬
‪ख़ुद में अकूत सम्पदाएँ समेटे ‬
‪दूर दूर तक फैला हुआ एक समुद्र! ‬
‪पर ध्यान रहे‬
‪तुम्हारी तलाश में हो जब कोई समुद्र‬
‪मत डूब जाना ‬
‪किसी नदी की उथली गहराईयों में!‬
- Adv Sanu Shukla

6 comments:

  1. बहुत खूब

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (19-09-2019) को      "दूषित हुआ समीर"   (चर्चा अंक- 3463)     पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत आभार सर

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  3. बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीय
    सादर

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    1. बहुत बहुत आभार मैम

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