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Friday, February 12, 2016

दूरियां बढ़ने लगी हैं

चल री सखी पनघट पर उसने पुकार दी है,
कि बन्सरी की मधुर तान अब आने लगी है |१| 

भरोसा हो गया है जल्द होंगे  साहिलों पर, 
कि ये किश्तियाँ लहरों से टकराने लगीं है |२| 

ये अँधेरे कुछ समय तक और है तू हौसला रख, 
कि ये चिड़ियाँ सुबह के गीत फिर गाने लगीं है |३| 

वो समय कुछ और था और ये समय कुछ और है, 
कि इसमे आदमी से आदमी की दूरियां बढ़ने लगीं है |४| 

नकाब  जो  चहरे पे  है  अपने हटा  दो मेहेरबां, 
कि फलक पर  घटाओं की कालिमा छाने लगी है |५| 

भँवरे बेचारे फूल के चक्कर लगायें किस तरह, 
कि जब कलियाँ टूटकर बाजार में बिकने लगीं है |६| 

तुम जैसे भी हो  हू-ब-हू  कैसे दिखाए आईना, 
कि जब चेहरे पे चेहरों की कई परतें लगीं है |७|

-सानू शुक्ल एड0

(लगभग 2 साल पुरानी पोस्ट जो कि ड्राफ्ट में पड़ी थी आज साझा कर रहा हूँ )

Saturday, July 24, 2010

बरसात











पानी बरसा धरती में खिल उठीं कोपलें
और मिट गयीं धरती में सब पड़ी दरारें
        पेड़ो पर फिर पत्ते झूमे
       आँखों में छाई हरियाली
       कोयल ने छेड़ी है फिर से
       वही पुरानी कूक निराली
मन यही कर रहा है की बस वह सुनते जाएँ
        जड़ चेतन  सब झूम रहे है
        मिल कर गाते मेघ मल्हारें
        बिना रुके तुम बरसो बादल
        छा जाओ मन मंडल पर
मन में आता है की पंक्षी सा हम खूब नहाये,
        खेतों  में फसलें लहलायें
        कृषकों के चहरे मुसकाएं
        झूमे गाँव आज फिर मस्ती में
       और ख़ुशी भारत की हर बस्ती में
मन यही मनाता बादर अपना तन मन वारे...!!

Thursday, July 8, 2010

कुछ हाइकु कवितायेँ भाग-२

(१)- दरीचे खुले
          हवा के साथ आयी
      तेरी खुशुबू |

 

(२)- कह भी तो दो
           कहना है जो,वर्ना
      रोना है क्या?
 
(३)- उडी चिड़िया
         पंखों को फैलाकर
       दाना लेकर |
 

(४)- उसने कहा
           हम साथ चलेंगे
     बन के साया |
 

(५)- पत्थर आया
           टूटा आइना जैसे
      मेरा विश्वाश |

Saturday, June 12, 2010

आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है तितली बनकर








आज इच्छाएं मेरी
उड़ रही है
जैसे उडती तितलियाँ हो,
वो ठहरती ही नहीं
किसी पल
किसी एक फूल  पर
और ये मेरा नादाँ मन
कर रहा है कोशिश पकड़ने की
उन तितली बनी इच्छाओं को
एक अबोध बालक की तरह
और फिर चाहता की कैद कर ले उन्हें
जिससे वो न उड़ सके दुबारा,
पर हर बार की तरह ही
इस बार भी
हो रहा है मन असफल मेरा
न तो वह बच्चा ही पकड़ पा रहा है तितलियों को
और न ही ये मेरा मन मेरी उन  इच्छाओं को
जो खुद भी नाच रही है
और नचा रही है मुझे
कब से..?
जब से आंख खोली है तबसे...!!